राम मंदिर-बाबरी मस्जिद: जानिये छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में क्या और कैसे हुआ था? | ram mandir babri masjid know what happen on 6th december 1992 in ayodhya: Hindipost News




राम मंदिर-बाबरी मस्जिद: जानिये छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में क्या और कैसे हुआ था?

Updated on 04 Dec 2017 by Hindipost


                    

अयोध्या में राम मंदिर विवाद ने तब एक बड़ा मोड़ ले लिया था जब छह दिसंबर 1992 को लाखों कारसेवकों की भीड़ ने विवादित ढांचा गिरा दिया गया। उस वक्त उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार थी और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे। 
अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद को लेकर आज सुप्रीम कोर्ट में सबसे बड़ी सुनवाई

दरअसल छह दिसंबर सन 1992 को अयोध्या में जो हुआ उसकी नींव 1990 में आडवाणी की रथयात्रा से ही पड़ गई थी। तब ये नारा दिया गया था कि ‘कसम राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनाएंगे’ यानी जहां बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा खड़ा था वहीं पर मंदिर बनेगा। 
पांच दिसंबर 1992 को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के एक बयान ने हवा का रुख बदल दिया। उन्होंने कहा था, ‘’उस जगह को समतल तो करना पड़ेगा।’’ वाजपेयी के इस भाषण के अगले ही दिन अयोध्या में लाखों कारसेवकों की भीड़ जुट चुकी थी। इस भीड़ के साथ-साथ बीजेपी, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के तमाम नेता ढांचे के पास बने मंच पर मौजूद थे। 

उस दिन सुबह करीब 11 बजे कुछ कारसेवक ढांचे के आसपास बनी रेलिंग को फांदकर अंदर घुसने की कोशिश करने लगे। अंदर तैनात पीएसी के जवानों ने उन्हें रोका तो उन पर पथराव शुरू हो गया था। किसी के हाथ में फावड़े तो कोई हथौड़े लेकर विवादित ढांचे की तरफ बढ़ा चला जा रहा था। 
यही नहीं ढांचे को गिराने के लिए बड़ी-बड़ी रस्सियों का इंतजाम भी पहले से कर लिया गया था। इतनी तैयारी के साथ आई कारसेवकों की भीड़ में से कुछ लोग जल्द ही गुंबद तक पहुंच गए और फिर देखते ही देखते गुंबद को गिरा दिया गया। 




राम मंदिर-बाबरी मस्जिद: जानिये छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में क्या और कैसे हुआ था?

Updated on 04 Dec 2017 by Hindipost



              

अयोध्या में राम मंदिर विवाद ने तब एक बड़ा मोड़ ले लिया था जब छह दिसंबर 1992 को लाखों कारसेवकों की भीड़ ने विवादित ढांचा गिरा दिया गया। उस वक्त उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार थी और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे। 
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दरअसल छह दिसंबर सन 1992 को अयोध्या में जो हुआ उसकी नींव 1990 में आडवाणी की रथयात्रा से ही पड़ गई थी। तब ये नारा दिया गया था कि ‘कसम राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनाएंगे’ यानी जहां बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा खड़ा था वहीं पर मंदिर बनेगा। 
पांच दिसंबर 1992 को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के एक बयान ने हवा का रुख बदल दिया। उन्होंने कहा था, ‘’उस जगह को समतल तो करना पड़ेगा।’’ वाजपेयी के इस भाषण के अगले ही दिन अयोध्या में लाखों कारसेवकों की भीड़ जुट चुकी थी। इस भीड़ के साथ-साथ बीजेपी, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के तमाम नेता ढांचे के पास बने मंच पर मौजूद थे। 

उस दिन सुबह करीब 11 बजे कुछ कारसेवक ढांचे के आसपास बनी रेलिंग को फांदकर अंदर घुसने की कोशिश करने लगे। अंदर तैनात पीएसी के जवानों ने उन्हें रोका तो उन पर पथराव शुरू हो गया था। किसी के हाथ में फावड़े तो कोई हथौड़े लेकर विवादित ढांचे की तरफ बढ़ा चला जा रहा था। 
यही नहीं ढांचे को गिराने के लिए बड़ी-बड़ी रस्सियों का इंतजाम भी पहले से कर लिया गया था। इतनी तैयारी के साथ आई कारसेवकों की भीड़ में से कुछ लोग जल्द ही गुंबद तक पहुंच गए और फिर देखते ही देखते गुंबद को गिरा दिया गया। 







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Updated on 04 Dec 2017 by Hindipost


              

अयोध्या में राम मंदिर विवाद ने तब एक बड़ा मोड़ ले लिया था जब छह दिसंबर 1992 को लाखों कारसेवकों की भीड़ ने विवादित ढांचा गिरा दिया गया। उस वक्त उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार थी और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे। 
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दरअसल छह दिसंबर सन 1992 को अयोध्या में जो हुआ उसकी नींव 1990 में आडवाणी की रथयात्रा से ही पड़ गई थी। तब ये नारा दिया गया था कि ‘कसम राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनाएंगे’ यानी जहां बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा खड़ा था वहीं पर मंदिर बनेगा। 
पांच दिसंबर 1992 को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के एक बयान ने हवा का रुख बदल दिया। उन्होंने कहा था, ‘’उस जगह को समतल तो करना पड़ेगा।’’ वाजपेयी के इस भाषण के अगले ही दिन अयोध्या में लाखों कारसेवकों की भीड़ जुट चुकी थी। इस भीड़ के साथ-साथ बीजेपी, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के तमाम नेता ढांचे के पास बने मंच पर मौजूद थे। 

उस दिन सुबह करीब 11 बजे कुछ कारसेवक ढांचे के आसपास बनी रेलिंग को फांदकर अंदर घुसने की कोशिश करने लगे। अंदर तैनात पीएसी के जवानों ने उन्हें रोका तो उन पर पथराव शुरू हो गया था। किसी के हाथ में फावड़े तो कोई हथौड़े लेकर विवादित ढांचे की तरफ बढ़ा चला जा रहा था। 
यही नहीं ढांचे को गिराने के लिए बड़ी-बड़ी रस्सियों का इंतजाम भी पहले से कर लिया गया था। इतनी तैयारी के साथ आई कारसेवकों की भीड़ में से कुछ लोग जल्द ही गुंबद तक पहुंच गए और फिर देखते ही देखते गुंबद को गिरा दिया गया।