सोइचिरो होंडा का संघर्षपूर्ण जीवन, एक लोहार से होंडा के फाउंडर बनने तक का सफर | Soichiro Honda struggling life journey from being a Blacksmith to Honda Founder: Hindipost News




सोइचिरो होंडा का संघर्षपूर्ण जीवन, एक लोहार से होंडा के फाउंडर बनने तक का सफर

Updated on 13 May 2017 by Hindipost


                    

यह कहानी जापान के इंजिनियर और होंडा मोटर प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक सोइचिरो हौंडा की है।  होंडा का जन्म जापान में १९०६ में हुआ। उन्होंने अपना शुरूआती जीवन अपने पिता के साथ बिताया जहाँ वे अपने पिता जो पेशे से लोहार थे वह अपने पिता को बाइसिकल रिपेयर बिजनेस में सहयोग करते थे। उनको बचपन से ही मोटर गाडियों में रूचि थी। उन्होंने ज्यादा पढाई नहीं की और १५ साल की उम्र में ही टोक्यो काम की तलाश में चले गए थे।

१९२८ मे ऑटोरिपेयर का बिजनेस शुरू करने वे वापिस घर लौटे। १९३७ में सोइचिरो होंडा ने छोटे इंजनो के लिए पिस्टन रिंग्स बनाई। वे इसे बड़ी कार निर्माता कंपनी टोयोटा को बेचना चाहते थे। और जल्दी ही उन्हें टोयोटा को पिस्टन रिंग्स सप्लाई करने का कॉन्ट्रैक्ट मिल गया लेकिन आवश्यक गुणवत्ता  को प्राप्त न कर पाने के कारण उन्होंने ये कॉन्ट्रैक्ट खो दिया। लेकिन कभी भी उन्होंने हार नहीं मानी और इंजनो की गुणवत्ता में और अधिक सुधार करने के लिए वे विभिन्न कंपनीयों के मालिको से मिले ताकि बेहतर पिस्टन रिंग्स बना सके।

जल्द ही उन्होंने ऐसा तरीका खोज निकाला जिससे और अधिक गुणवत्ता के पिस्टन रिंग्स तैयार हो सके. टोयोटा को यह प्रोडक्ट पसंद आ गया और १९४१ में उन्होंने इसे खरीद लिया। अपने प्रोडक्ट्स को बड़े पैमाने पर बेचने के लिए उन्होंने तोकाई सेकी नामक कंपनी शुरू की। जल्द ही टोयोटा ने इसके ४० प्रतिशत शेयर खरीद लिए और टोयोटा और होंडा के बीच व्यापारिक संबंध कायम हो गया। लेकिन लगातार आये संकटो ने कंपनी को बहुत नुकसान पहुँचाया, जिसके कारण सोइचिरो होंडा को कंपनी का शेष भाग भी टोयोटा को बेचना पड़ा। लेकिन सोइचिरो होंडा यंही नहीं रुके, दूसरे विश्व युद्ध में जापान हार गया, इस युद्ध ने जापान पर कहर ढा दिया।

सोइचिरो होंडा ने अमेरिका के जवानो द्वारा फेंके गए गैसोलीन कैन्स को एकत्र करना शुरू किया। ये उनके लिए कच्चे माल की तरह था जिससे निर्माण प्रक्रिया दोबारा शुरू कर सकते थे. लेकिन भूकंप ने फैक्ट्री को नष्ट कर दिया. युद्ध के बाद गैसोलीन की कमी से लोगो को पैदल या बाइसिकल से चलने को मजबूर कर दिया था। सोइचिरो होंडा ने एक छोटा इंजन बना कर इसे बाइसिकल से जोड़ दिया। लेकिन यहाँ पर भी उनके सामने समस्या थी मांग को पूरा करने की जिसमे वे समर्थ न हो सके क्योंकि पर्याप्त मैटेरियल की कमी थी. लेकिन उन्होंने अभी भी हार नहीं मानी थी।

अपनी कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने पहला बाइसिकल इंजन निकाला लेकिन थोडा भारी होने  की वजह से इसमें अभी दिक्कत थी इसलिए इसमें सुधार के लिए वे निरंतर मेहनत करते गए. आख़िरकार उन्हें सफलता हाथ लगी जब उन्होंने पहला छोटा इंजन द सुपर कब  बनाया। सोइचिरो होंडा इसे यूरोप और अमेरिका भी निर्यात करने लगे। १९४९ में होंडा ने मॉडल डी लॉन्च किया ये पहली पूरी मोटरसाइकल थी जो उन्होंने अपने पार्ट्स से बनाई थी।  जल्द ही इसकी मांग बढ़ी और होंडा १९६४ तक मोटरसाईकल बेचने वाली सबसे बड़ी कंपनी बन गयी थी। सोइचिरो होंडा ने बाद में कारे भी बनाई जिसमे सबसे कामयाब अक्युरा और होंडा nsx सुपरकार भी शामिल है।

आज होंडा कंपनी विश्व की सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनियों में से एक है, सड़क पर चलते फिरते आपको होंडा का कोई न कोई वाहन तो दिख ही जाता होगा। लेकिन होंडा के लिए यह सब इसलिए संभव हो पाया उनके कभी हार न मानने के जज्बे से। ये उनका निश्चय और उस पर उनका विश्वास ही था की उन्होंने तब भी अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ा और अंत में सलफता पाई।




सोइचिरो होंडा का संघर्षपूर्ण जीवन, एक लोहार से होंडा के फाउंडर बनने तक का सफर

Updated on 13 May 2017 by Hindipost



              

यह कहानी जापान के इंजिनियर और होंडा मोटर प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक सोइचिरो हौंडा की है।  होंडा का जन्म जापान में १९०६ में हुआ। उन्होंने अपना शुरूआती जीवन अपने पिता के साथ बिताया जहाँ वे अपने पिता जो पेशे से लोहार थे वह अपने पिता को बाइसिकल रिपेयर बिजनेस में सहयोग करते थे। उनको बचपन से ही मोटर गाडियों में रूचि थी। उन्होंने ज्यादा पढाई नहीं की और १५ साल की उम्र में ही टोक्यो काम की तलाश में चले गए थे।

१९२८ मे ऑटोरिपेयर का बिजनेस शुरू करने वे वापिस घर लौटे। १९३७ में सोइचिरो होंडा ने छोटे इंजनो के लिए पिस्टन रिंग्स बनाई। वे इसे बड़ी कार निर्माता कंपनी टोयोटा को बेचना चाहते थे। और जल्दी ही उन्हें टोयोटा को पिस्टन रिंग्स सप्लाई करने का कॉन्ट्रैक्ट मिल गया लेकिन आवश्यक गुणवत्ता  को प्राप्त न कर पाने के कारण उन्होंने ये कॉन्ट्रैक्ट खो दिया। लेकिन कभी भी उन्होंने हार नहीं मानी और इंजनो की गुणवत्ता में और अधिक सुधार करने के लिए वे विभिन्न कंपनीयों के मालिको से मिले ताकि बेहतर पिस्टन रिंग्स बना सके।

जल्द ही उन्होंने ऐसा तरीका खोज निकाला जिससे और अधिक गुणवत्ता के पिस्टन रिंग्स तैयार हो सके. टोयोटा को यह प्रोडक्ट पसंद आ गया और १९४१ में उन्होंने इसे खरीद लिया। अपने प्रोडक्ट्स को बड़े पैमाने पर बेचने के लिए उन्होंने तोकाई सेकी नामक कंपनी शुरू की। जल्द ही टोयोटा ने इसके ४० प्रतिशत शेयर खरीद लिए और टोयोटा और होंडा के बीच व्यापारिक संबंध कायम हो गया। लेकिन लगातार आये संकटो ने कंपनी को बहुत नुकसान पहुँचाया, जिसके कारण सोइचिरो होंडा को कंपनी का शेष भाग भी टोयोटा को बेचना पड़ा। लेकिन सोइचिरो होंडा यंही नहीं रुके, दूसरे विश्व युद्ध में जापान हार गया, इस युद्ध ने जापान पर कहर ढा दिया।

सोइचिरो होंडा ने अमेरिका के जवानो द्वारा फेंके गए गैसोलीन कैन्स को एकत्र करना शुरू किया। ये उनके लिए कच्चे माल की तरह था जिससे निर्माण प्रक्रिया दोबारा शुरू कर सकते थे. लेकिन भूकंप ने फैक्ट्री को नष्ट कर दिया. युद्ध के बाद गैसोलीन की कमी से लोगो को पैदल या बाइसिकल से चलने को मजबूर कर दिया था। सोइचिरो होंडा ने एक छोटा इंजन बना कर इसे बाइसिकल से जोड़ दिया। लेकिन यहाँ पर भी उनके सामने समस्या थी मांग को पूरा करने की जिसमे वे समर्थ न हो सके क्योंकि पर्याप्त मैटेरियल की कमी थी. लेकिन उन्होंने अभी भी हार नहीं मानी थी।

अपनी कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने पहला बाइसिकल इंजन निकाला लेकिन थोडा भारी होने  की वजह से इसमें अभी दिक्कत थी इसलिए इसमें सुधार के लिए वे निरंतर मेहनत करते गए. आख़िरकार उन्हें सफलता हाथ लगी जब उन्होंने पहला छोटा इंजन द सुपर कब  बनाया। सोइचिरो होंडा इसे यूरोप और अमेरिका भी निर्यात करने लगे। १९४९ में होंडा ने मॉडल डी लॉन्च किया ये पहली पूरी मोटरसाइकल थी जो उन्होंने अपने पार्ट्स से बनाई थी।  जल्द ही इसकी मांग बढ़ी और होंडा १९६४ तक मोटरसाईकल बेचने वाली सबसे बड़ी कंपनी बन गयी थी। सोइचिरो होंडा ने बाद में कारे भी बनाई जिसमे सबसे कामयाब अक्युरा और होंडा nsx सुपरकार भी शामिल है।

आज होंडा कंपनी विश्व की सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनियों में से एक है, सड़क पर चलते फिरते आपको होंडा का कोई न कोई वाहन तो दिख ही जाता होगा। लेकिन होंडा के लिए यह सब इसलिए संभव हो पाया उनके कभी हार न मानने के जज्बे से। ये उनका निश्चय और उस पर उनका विश्वास ही था की उन्होंने तब भी अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ा और अंत में सलफता पाई।







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सोइचिरो होंडा का संघर्षपूर्ण जीवन, एक लोहार से होंडा के फाउंडर बनने तक का सफर

Updated on 13 May 2017 by Hindipost


              

यह कहानी जापान के इंजिनियर और होंडा मोटर प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक सोइचिरो हौंडा की है।  होंडा का जन्म जापान में १९०६ में हुआ। उन्होंने अपना शुरूआती जीवन अपने पिता के साथ बिताया जहाँ वे अपने पिता जो पेशे से लोहार थे वह अपने पिता को बाइसिकल रिपेयर बिजनेस में सहयोग करते थे। उनको बचपन से ही मोटर गाडियों में रूचि थी। उन्होंने ज्यादा पढाई नहीं की और १५ साल की उम्र में ही टोक्यो काम की तलाश में चले गए थे।

१९२८ मे ऑटोरिपेयर का बिजनेस शुरू करने वे वापिस घर लौटे। १९३७ में सोइचिरो होंडा ने छोटे इंजनो के लिए पिस्टन रिंग्स बनाई। वे इसे बड़ी कार निर्माता कंपनी टोयोटा को बेचना चाहते थे। और जल्दी ही उन्हें टोयोटा को पिस्टन रिंग्स सप्लाई करने का कॉन्ट्रैक्ट मिल गया लेकिन आवश्यक गुणवत्ता  को प्राप्त न कर पाने के कारण उन्होंने ये कॉन्ट्रैक्ट खो दिया। लेकिन कभी भी उन्होंने हार नहीं मानी और इंजनो की गुणवत्ता में और अधिक सुधार करने के लिए वे विभिन्न कंपनीयों के मालिको से मिले ताकि बेहतर पिस्टन रिंग्स बना सके।

जल्द ही उन्होंने ऐसा तरीका खोज निकाला जिससे और अधिक गुणवत्ता के पिस्टन रिंग्स तैयार हो सके. टोयोटा को यह प्रोडक्ट पसंद आ गया और १९४१ में उन्होंने इसे खरीद लिया। अपने प्रोडक्ट्स को बड़े पैमाने पर बेचने के लिए उन्होंने तोकाई सेकी नामक कंपनी शुरू की। जल्द ही टोयोटा ने इसके ४० प्रतिशत शेयर खरीद लिए और टोयोटा और होंडा के बीच व्यापारिक संबंध कायम हो गया। लेकिन लगातार आये संकटो ने कंपनी को बहुत नुकसान पहुँचाया, जिसके कारण सोइचिरो होंडा को कंपनी का शेष भाग भी टोयोटा को बेचना पड़ा। लेकिन सोइचिरो होंडा यंही नहीं रुके, दूसरे विश्व युद्ध में जापान हार गया, इस युद्ध ने जापान पर कहर ढा दिया।

सोइचिरो होंडा ने अमेरिका के जवानो द्वारा फेंके गए गैसोलीन कैन्स को एकत्र करना शुरू किया। ये उनके लिए कच्चे माल की तरह था जिससे निर्माण प्रक्रिया दोबारा शुरू कर सकते थे. लेकिन भूकंप ने फैक्ट्री को नष्ट कर दिया. युद्ध के बाद गैसोलीन की कमी से लोगो को पैदल या बाइसिकल से चलने को मजबूर कर दिया था। सोइचिरो होंडा ने एक छोटा इंजन बना कर इसे बाइसिकल से जोड़ दिया। लेकिन यहाँ पर भी उनके सामने समस्या थी मांग को पूरा करने की जिसमे वे समर्थ न हो सके क्योंकि पर्याप्त मैटेरियल की कमी थी. लेकिन उन्होंने अभी भी हार नहीं मानी थी।

अपनी कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने पहला बाइसिकल इंजन निकाला लेकिन थोडा भारी होने  की वजह से इसमें अभी दिक्कत थी इसलिए इसमें सुधार के लिए वे निरंतर मेहनत करते गए. आख़िरकार उन्हें सफलता हाथ लगी जब उन्होंने पहला छोटा इंजन द सुपर कब  बनाया। सोइचिरो होंडा इसे यूरोप और अमेरिका भी निर्यात करने लगे। १९४९ में होंडा ने मॉडल डी लॉन्च किया ये पहली पूरी मोटरसाइकल थी जो उन्होंने अपने पार्ट्स से बनाई थी।  जल्द ही इसकी मांग बढ़ी और होंडा १९६४ तक मोटरसाईकल बेचने वाली सबसे बड़ी कंपनी बन गयी थी। सोइचिरो होंडा ने बाद में कारे भी बनाई जिसमे सबसे कामयाब अक्युरा और होंडा nsx सुपरकार भी शामिल है।

आज होंडा कंपनी विश्व की सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनियों में से एक है, सड़क पर चलते फिरते आपको होंडा का कोई न कोई वाहन तो दिख ही जाता होगा। लेकिन होंडा के लिए यह सब इसलिए संभव हो पाया उनके कभी हार न मानने के जज्बे से। ये उनका निश्चय और उस पर उनका विश्वास ही था की उन्होंने तब भी अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ा और अंत में सलफता पाई।