क्या आप जानते निरमा साबुन के पीछे की संघर्ष की कहानी जो आज एक बड़ी कंपनी उबर के सामने आयी है | do you know the struggle behind nirma soap and detergent creation: Hindipost News




क्या आप जानते निरमा साबुन के पीछे की संघर्ष की कहानी जो आज एक बड़ी कंपनी उबर के सामने आयी है

Updated on 09 May 2017 by Hindipost


                    

करसनभाई पटेल का जन्म 13 अप्रैल 1944 को गुजरात के मेहसाना गाव के एक सामान्य किसान परिवार में हुआ था। करसनभाई की प्रारंभिक शिक्षा मेहसाना के स्थानीय स्कूल में हुई और 21 साल की उम्र में उन्होंने राशन शाष्त्र विषय के साथ बी.एस.सी की पढ़ाई पूरी की और एक प्रयोगशाला सहायक के तौर पर नौकरी करने लगे थे ।

करसनभाई पटेल भारत के जाने-माने उद्योगपति और निरमा समूह के संस्थापक हैं। निरमा समूह सौंदर्य प्रसाधन, साबुन, डिटर्जेंट, नमक, सोडा ऐश, प्रयोगशाला और चिकित्सकीय इंजेक्टिबल्स और कई सारी चीज़ों का विनिर्माण करता है। सन 1969 में एक छोटे से कमरे से निरमा पाउडर की शुरुआत हुई और डॉ पटेल की लगन और कड़ी मेहनत से फलता-फूलता गया और आज वे भारत के सबसे धनी व्यक्तियों की सूचि में भी शामिल होते हैं। उन्होंने यह निरमा पाउडर का काम अपनी नौकरी के साथ-साथ किया और कार्यालय जाते समय वे इसकी बिक्री करते थे और शाम को वापस आकर वे  अपने उसी कमरे में डिटर्जेंट का निर्माण और पैकिंग करते थे। एक आंकड़े के अनुसार सन 2004 निरमा में कुल 15000 से अधिक कर्मचारी थे और 3550 करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार था।
सन 2004 में निरमा कंपनी ने लगभग 14000 लोगों को रोज़गार दे दिया था।

सस्ते डिटर्जेंट बाज़ार में अपना पैर जमाने के बाद निरमा ने महसूस किया कि उच्च आयवर्ग को ध्यान में रखते हुए नए उत्पादों की शुरुआत करना जरुरी है ताकि कंपनी मध्यम वर्ग के उपभोक्ताओं के साथ-साथ ऊपरी आय वर्ग में भी अपनी जगह बना सके। इस दृष्टि से निरमा ने प्रीमियम क्षेत्र में प्रवेश किया जिसके अंतर्गत निरमा ने ‘निरमा बाथ’, ‘निरमा ब्यूटी सोप’ और प्रीमियम पाउडर ‘सुपर निरमा डिटर्जेंट’ जैसे कई उत्पादों को बाज़ार में उतारा। निरमा ने शैम्पू और टूथपेस्ट के क्षेत्र में भी पाँव पसारने की कोशिश की पर उस छेत्र में उन्हें इतनी सफलता नहीं मिली। निरमा ने ‘शुद्ध’ नाम से खाने का नमक भी बाज़ार में उतारा जो लोगो को पसंद आया और काफी सफल रहा।
साबुन बाज़ार में निरमा की लगभग 20 प्रतिशत हिस्सेदारी है जबकि डिटर्जेंट पाउडर के क्षेत्र में लगभग 35 प्रतिशत बाज़ार निरमा के कब्ज़े में है।
करसनभाई ने वाशिंग पाउडर की कीमत 3 रूपए 1 किल्लो ग्राम पर रखा था। जबकि उस समय पे मार्केट में जो बाकि कंपनी के पाउडर थे उनकी कम से कम कीमत 30 रूपए थी।

क्योंकि उनको अपने निरमा पाउडर की क्वालिटी पर भरोसा था तो उन्होंने पैसे वापस करने की गारंटी भी देदी। खुद ही अपनी मेहनत से प्रोडक्ट बनाते थे और खुद ही प्रोडक्ट को बाज़ार में बेचते थे। ऐसे अपनी रोज-रोज की मेहनत से वो अहमदाबाद की माध्यम वर्ग के लोगो में बिच में अपने वाशिंग पाउडर को फेमस करते गये।
लोग इस सस्ते और अच्छे पाउडर को ही खरीदने की इच्छा रखने लगे और धीरे-धीरे निरमा भारत के टॉप ब्रांड में शामिल हो गया।




क्या आप जानते निरमा साबुन के पीछे की संघर्ष की कहानी जो आज एक बड़ी कंपनी उबर के सामने आयी है

Updated on 09 May 2017 by Hindipost



              

करसनभाई पटेल का जन्म 13 अप्रैल 1944 को गुजरात के मेहसाना गाव के एक सामान्य किसान परिवार में हुआ था। करसनभाई की प्रारंभिक शिक्षा मेहसाना के स्थानीय स्कूल में हुई और 21 साल की उम्र में उन्होंने राशन शाष्त्र विषय के साथ बी.एस.सी की पढ़ाई पूरी की और एक प्रयोगशाला सहायक के तौर पर नौकरी करने लगे थे ।

करसनभाई पटेल भारत के जाने-माने उद्योगपति और निरमा समूह के संस्थापक हैं। निरमा समूह सौंदर्य प्रसाधन, साबुन, डिटर्जेंट, नमक, सोडा ऐश, प्रयोगशाला और चिकित्सकीय इंजेक्टिबल्स और कई सारी चीज़ों का विनिर्माण करता है। सन 1969 में एक छोटे से कमरे से निरमा पाउडर की शुरुआत हुई और डॉ पटेल की लगन और कड़ी मेहनत से फलता-फूलता गया और आज वे भारत के सबसे धनी व्यक्तियों की सूचि में भी शामिल होते हैं। उन्होंने यह निरमा पाउडर का काम अपनी नौकरी के साथ-साथ किया और कार्यालय जाते समय वे इसकी बिक्री करते थे और शाम को वापस आकर वे  अपने उसी कमरे में डिटर्जेंट का निर्माण और पैकिंग करते थे। एक आंकड़े के अनुसार सन 2004 निरमा में कुल 15000 से अधिक कर्मचारी थे और 3550 करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार था।
सन 2004 में निरमा कंपनी ने लगभग 14000 लोगों को रोज़गार दे दिया था।

सस्ते डिटर्जेंट बाज़ार में अपना पैर जमाने के बाद निरमा ने महसूस किया कि उच्च आयवर्ग को ध्यान में रखते हुए नए उत्पादों की शुरुआत करना जरुरी है ताकि कंपनी मध्यम वर्ग के उपभोक्ताओं के साथ-साथ ऊपरी आय वर्ग में भी अपनी जगह बना सके। इस दृष्टि से निरमा ने प्रीमियम क्षेत्र में प्रवेश किया जिसके अंतर्गत निरमा ने ‘निरमा बाथ’, ‘निरमा ब्यूटी सोप’ और प्रीमियम पाउडर ‘सुपर निरमा डिटर्जेंट’ जैसे कई उत्पादों को बाज़ार में उतारा। निरमा ने शैम्पू और टूथपेस्ट के क्षेत्र में भी पाँव पसारने की कोशिश की पर उस छेत्र में उन्हें इतनी सफलता नहीं मिली। निरमा ने ‘शुद्ध’ नाम से खाने का नमक भी बाज़ार में उतारा जो लोगो को पसंद आया और काफी सफल रहा।
साबुन बाज़ार में निरमा की लगभग 20 प्रतिशत हिस्सेदारी है जबकि डिटर्जेंट पाउडर के क्षेत्र में लगभग 35 प्रतिशत बाज़ार निरमा के कब्ज़े में है।
करसनभाई ने वाशिंग पाउडर की कीमत 3 रूपए 1 किल्लो ग्राम पर रखा था। जबकि उस समय पे मार्केट में जो बाकि कंपनी के पाउडर थे उनकी कम से कम कीमत 30 रूपए थी।

क्योंकि उनको अपने निरमा पाउडर की क्वालिटी पर भरोसा था तो उन्होंने पैसे वापस करने की गारंटी भी देदी। खुद ही अपनी मेहनत से प्रोडक्ट बनाते थे और खुद ही प्रोडक्ट को बाज़ार में बेचते थे। ऐसे अपनी रोज-रोज की मेहनत से वो अहमदाबाद की माध्यम वर्ग के लोगो में बिच में अपने वाशिंग पाउडर को फेमस करते गये।
लोग इस सस्ते और अच्छे पाउडर को ही खरीदने की इच्छा रखने लगे और धीरे-धीरे निरमा भारत के टॉप ब्रांड में शामिल हो गया।







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क्या आप जानते निरमा साबुन के पीछे की संघर्ष की कहानी जो आज एक बड़ी कंपनी उबर के सामने आयी है

Updated on 09 May 2017 by Hindipost


              

करसनभाई पटेल का जन्म 13 अप्रैल 1944 को गुजरात के मेहसाना गाव के एक सामान्य किसान परिवार में हुआ था। करसनभाई की प्रारंभिक शिक्षा मेहसाना के स्थानीय स्कूल में हुई और 21 साल की उम्र में उन्होंने राशन शाष्त्र विषय के साथ बी.एस.सी की पढ़ाई पूरी की और एक प्रयोगशाला सहायक के तौर पर नौकरी करने लगे थे ।

करसनभाई पटेल भारत के जाने-माने उद्योगपति और निरमा समूह के संस्थापक हैं। निरमा समूह सौंदर्य प्रसाधन, साबुन, डिटर्जेंट, नमक, सोडा ऐश, प्रयोगशाला और चिकित्सकीय इंजेक्टिबल्स और कई सारी चीज़ों का विनिर्माण करता है। सन 1969 में एक छोटे से कमरे से निरमा पाउडर की शुरुआत हुई और डॉ पटेल की लगन और कड़ी मेहनत से फलता-फूलता गया और आज वे भारत के सबसे धनी व्यक्तियों की सूचि में भी शामिल होते हैं। उन्होंने यह निरमा पाउडर का काम अपनी नौकरी के साथ-साथ किया और कार्यालय जाते समय वे इसकी बिक्री करते थे और शाम को वापस आकर वे  अपने उसी कमरे में डिटर्जेंट का निर्माण और पैकिंग करते थे। एक आंकड़े के अनुसार सन 2004 निरमा में कुल 15000 से अधिक कर्मचारी थे और 3550 करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार था।
सन 2004 में निरमा कंपनी ने लगभग 14000 लोगों को रोज़गार दे दिया था।

सस्ते डिटर्जेंट बाज़ार में अपना पैर जमाने के बाद निरमा ने महसूस किया कि उच्च आयवर्ग को ध्यान में रखते हुए नए उत्पादों की शुरुआत करना जरुरी है ताकि कंपनी मध्यम वर्ग के उपभोक्ताओं के साथ-साथ ऊपरी आय वर्ग में भी अपनी जगह बना सके। इस दृष्टि से निरमा ने प्रीमियम क्षेत्र में प्रवेश किया जिसके अंतर्गत निरमा ने ‘निरमा बाथ’, ‘निरमा ब्यूटी सोप’ और प्रीमियम पाउडर ‘सुपर निरमा डिटर्जेंट’ जैसे कई उत्पादों को बाज़ार में उतारा। निरमा ने शैम्पू और टूथपेस्ट के क्षेत्र में भी पाँव पसारने की कोशिश की पर उस छेत्र में उन्हें इतनी सफलता नहीं मिली। निरमा ने ‘शुद्ध’ नाम से खाने का नमक भी बाज़ार में उतारा जो लोगो को पसंद आया और काफी सफल रहा।
साबुन बाज़ार में निरमा की लगभग 20 प्रतिशत हिस्सेदारी है जबकि डिटर्जेंट पाउडर के क्षेत्र में लगभग 35 प्रतिशत बाज़ार निरमा के कब्ज़े में है।
करसनभाई ने वाशिंग पाउडर की कीमत 3 रूपए 1 किल्लो ग्राम पर रखा था। जबकि उस समय पे मार्केट में जो बाकि कंपनी के पाउडर थे उनकी कम से कम कीमत 30 रूपए थी।

क्योंकि उनको अपने निरमा पाउडर की क्वालिटी पर भरोसा था तो उन्होंने पैसे वापस करने की गारंटी भी देदी। खुद ही अपनी मेहनत से प्रोडक्ट बनाते थे और खुद ही प्रोडक्ट को बाज़ार में बेचते थे। ऐसे अपनी रोज-रोज की मेहनत से वो अहमदाबाद की माध्यम वर्ग के लोगो में बिच में अपने वाशिंग पाउडर को फेमस करते गये।
लोग इस सस्ते और अच्छे पाउडर को ही खरीदने की इच्छा रखने लगे और धीरे-धीरे निरमा भारत के टॉप ब्रांड में शामिल हो गया।